उत्तर वाहिनी बहती जहाँ गंगा
भोले की नगरी में हो जाता मन चंगा
वो एक शहर नहीं मेरी जान बनारस है
मोक्ष मिलती जिस नगरी में
हरिश्चंद्र और मणिकर्णिका घाट जहाँ पर
भोले की भक्ति में सब झूमे
मिलता श्री विश्वनाथ का धाम जहाँ पर
वो एक शहर नहीं मेरी जान बनारस है
शास्त्री जी जैसा महान जहाँ पर
प्रेमचंद का गोदान जहाँ पर
मिलता सबसे बढ़िया पान जहाँ पर
वो शहर नहीं मेरी जान बनारस है
भोले की धूनी में हर कोई रमा जहाँ पर
दबा के मगही पान मुँह में
करता महादेव की गुणगान जहाँ पर
बजती बिस्मिल्लाह खान की शहनाई जहाँ पर
वो शहर नहीं मेरी जान बनारस है।
पहलवान की लस्सी और अस्सी की शाम जहाँ पर
स्वयं विराजे भैरव बाबा बनकर काशी कोतवाल जहाँ पर
हर हर महादेव का नारा
गूँजता सुबह ऑ' शाम जहाँ पर
वो शहर नहीं मेरी जान बनारस है।
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