बचपन के दिन और माँ का आँचल

Written by: Komal Rawat | 13 Sep 2026

वो दिन भी क्या दिन थे, जब माँ लोरियां गाती थी। अपने आंचल की छांव से जब चुपके से उठाती थी। ठाठ हमारे कौन सा कम थे हम दोबारा से सो जाते थे। देख हमारे नखरे फिर वो जोरों से चिल्लाती थी। नहला धुला, कंघी तेल लगा जब स्कूल तक पहुंचाती थी। तब जाकर ही शायद वो एक निवाला खाती थी। दिन भर करती काम मगर माथे पे सिकन न आती थी। अक्सर अपनी फटी एड़ियां सबसे वो छिपाती थी। है कितने एहसान तेरे, इस जन्म चुका ना पाऊँगी। तेरे कदमों की मिट्टी अपने सर माथे लगाऊँगी।

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