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Vivek Dubey
Vivek Dubey
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Delhi, India
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Shayari
Poem
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Ghazal
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इश्क़, हुस्न और दीवार
दिलों में खींचने को है एक दीवार देखो। तल्ख़ निगाहों से होता है व्यापार देखो। रह न पाए कोई फ़र्क़ ज़र्रे ज़र्रे का कहीं, इश्क़ हुआ है हुस्न का सितमगर देखो।
Vivek Dubey
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राधा-कृष्ण प्रेम और समर्पण
मैं राधिका मन प्यासी बन कृष्ण सखा सी दासी। रच जाऊँ बस जाऊँ नैनन में भेद रहे न इस मन में उस मन में।
Vivek Dubey
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कर्म और सृजन का मार्ग
मंजिलें न तलाश तू, चला चल रास्ते पे तू। रास्ता वहीं तमाम होगा, जहाँ मँज़िल का मुक़ाम होगा। चिंता नहीं चिंतन कर तू, मातम नहीं मंथन कर तू। न उलझ दुनियाँ के फेर में, अपना ही सृजन कर तू।
Vivek Dubey
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विश्वास और आस्था की शक्ति
तुम पूजो जिस पत्थर को पर विश्वास भरो। हो जाएगा जड़ भी चेतन छूकर आभास करो। मुड़ जाती हैं धाराएँ भी सरिता की, इठलाती धाराओं को बाहुपाश भरो।
Vivek Dubey
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सच्चा लेखक और उसका सृजन
लिखता है वो बस लिखता है। अनुभव जीवन के लिखता है। नहीं कभी किताबों में छपता है, ना ही मंचों पर वो बिकता है।
Vivek Dubey
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ख्वाब और आफ़ताब
हम ख़्वाब देखते रह गए। अहसास सहजते रह गए। आए वो हिजाब में नज़र, हम आफ़ताब देखते रह गए।
Vivek Dubey
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सफर और साज
चलता रहा कल तक, आज की खातिर। बजता रहा साज भी, आवाज़ की खातिर। उतरती रहीं कुछ नज़्में, ख़्वाब ज़मीन पर, देती रहीं हसरतें हवा, नाज़ की खातिर।
Vivek Dubey
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माँ का आंचल और ममता
लिए हैयत का अहसास सीड़ा, ओ माँ तू बड़ी ख़ास ख़ास सी। मिलता है सुकूँ तेरे आँचल में, तेरी हँसी में सारी कायनात सी।
Vivek Dubey
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