जब मैं सोती हूँ, तब मैं ख्याबों को हूँ बुनती।
कभी परी तो कभी जादूगर हूँ मैं बनती।
अपने समस्याओं का स्वयं मैं निवारण हूँ करती।
नहीं-नहीं चुनौती का निर्माण मैं स्वयं हूँ करती।
कभी-कभी तो मैं ईश्वर से भी हूँ मिलती।
यह देख मैं हर्ष और उल्लास से हूँ भर जाती।
जब मैं सोती हूँ, तब मैं हूँ खो जाती।
कभी-कभी तो मैं किसी ओर दुनिया में ही गुम हो जाती।
कभी मैं परीक्षा में देर से हूँ पहुंचती,
तो कभी परीक्षा में आधा ही हूँ लिखती।
कभी मैं सपनो में सर्प को हूँ देखती,
तो कभी পাহাড় से गिरता है पत्थर।
यह देख आंखें सहम सी है जाती।
बार-बार मन को करती है विचलित।
जब मैं सोती हूँ, तब मैं दस्तानों को हूँ लिखती।
कभी अधूरी तो कभी पूरी कहानी का अफसाना हूँ बनती।
कभी दुखी तो कभी सुखी का अंबार हूँ मैं बनती।
अपने हार और जीत का आधार हूँ मैं बनती।
कभी-कभी तो मेरी गलतियां करती हैं परेशान।
फिर यही तो मेरी नई सोच और नई उम्मीदों का तराना हैं बुनती।
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